विद्यालयों में मीडिया प्रवेश रोकने का फरमान रद्द, DEO ने जारी किया स्पष्टीकरण
सिंगरौली:एक तरफ जहां देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव तक लोकतंत्र के चौथे स्तंभ यानी मीडिया का सम्मान करते हैं और पत्रकारों के सुझावों व खबरों को गंभीरता से लेते हैं, वहीं सिंगरौली जिले में एक अलग ही मामला सामने आया है। हाल ही में जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) का प्रभार संभालने वाली कविता त्रिपाठी की नजरों में पत्रकारों का काम कथित तौर पर व्यवधान पैदा करना नजर आया। उन्होंने चार्ज लेते ही सरकारी स्कूलों में पत्रकारों के प्रवेश पर रोक लगाने का फरमान जारी कर दिया। हालांकि, इस आदेश के निकलते ही सोशल मीडिया और स्थानीय स्तर पर इतना बड़ा बवाल मचा कि अधिकारी को अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने तत्काल एक नया संशोधित आदेश जारी कर अपनी सफाई पेश की।
पदभार ग्रहण करने के अगले ही दिन जारी हुआ विवादित फरमान
शिक्षा विभाग ने पिछले दिनों तेईस जून को एक प्रशासनिक आदेश जारी कर जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय सिंगरौली में पदस्थ अतिरिक्त जिला परियोजना समन्वयक कविता त्रिपाठी को सहायक संचालक के पद पर नियुक्त किया था। इसके साथ ही उन्हें जिला शिक्षा अधिकारी का अतिरिक्त प्रभार भी सौंप दिया गया। कविता त्रिपाठी ने इसके अगले ही दिन चौबीस जून को अपनी नई कुर्सी संभाली। लेकिन पूरे जिले की शिक्षा व्यवस्था की कमान हाथ में आते ही उन्होंने पच्चीस जून को एक ऐसा आदेश निकाल दिया, जिसने सबको हैरान कर दिया। इस आदेश में छात्र-छात्राओं की सुरक्षा और शैक्षणिक माहौल का हवाला देते हुए सरकारी स्कूलों में आम जनता के साथ-साथ मीडिया के प्रवेश पर भी पूरी तरह पाबंदी लगा दी गई।
आदेश में लिखा 'अवरोध', जनता ने कहा 'तुगलकी फरमान'
विवादित आदेश में साफ तौर पर लिखा गया था कि पत्रकारों और सामान्य लोगों का विद्यालयों में अनावश्यक रूप से जाना और निरीक्षण करना शासकीय कार्य में अवरोध पैदा करता है। इस भाषा को देखते ही स्थानीय मीडिया और आम जनता भड़क उठी। लोगों ने इसे पूरी तरह एक तुगलकी फरमान माना और सोशल मीडिया पर इसका पुरजोर विरोध शुरू कर दिया। स्थानीय अखबारों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर यह आदेश देखते ही देखते सुर्खियों में आ गया। मीडिया जगत और आम लोगों ने सवाल उठाए कि क्या पिछले जिला शिक्षा अधिकारी के कार्यकाल में हुई करोड़ों रुपये की कथित वित्तीय अनियमितताओं को दबाने और अपनी कमियों को छिपाने के लिए जनता और पत्रकारों का रास्ता रोका जा रहा है। स्थानीय लोगों का कहना था कि सरकारी स्कूल जनता के टैक्स के पैसे से चलते हैं, इसलिए उन्हें यह जानने का पूरा हक है कि स्कूलों के भीतर उनके बच्चों को कैसी शिक्षा मिल रही है।
विरोध के आगे बैकफुट पर आईं डीईओ, संशोधित आदेश में दी ये दलील
मामला बढ़ता देख और चारों तरफ से घिरने के बाद प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी कविता त्रिपाठी तुरंत बैकफुट पर आ गईं। माहौल को भांपते हुए उन्होंने छब्बीस जून को एक नया स्पष्टीकरण आदेश जारी किया। इस नए पत्र में उन्होंने दलील दी कि पिछला आदेश उन्होंने कुछ प्राचार्यों से मिली शिकायतों के आधार पर जारी किया था और उनका इरादा मीडिया की भूमिका को कमतर आंकना या रोकना बिल्कुल नहीं था। उन्होंने साफ किया कि उस आदेश का असल मकसद केवल इतना था कि बिना अनुमति के कोई भी बाहरी व्यक्ति स्कूल में घुसकर माहौल खराब न करे। उन्होंने आगे जोड़ा कि मान्यता प्राप्त पत्रकारों के प्रवेश पर कोई रोक नहीं है और वह आदेश केवल तथाकथित सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स के लिए था। बहरहाल, कुर्सी संभालते ही प्रभारी डीईओ को अपनी इस बड़ी चूक का अहसास हो गया और उन्होंने समय रहते इसे सुधार लिया, जिससे फिलहाल इस विवाद पर विराम लगता दिख रहा है।

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