रेत-ज़मीन-शराब में उलझे नेता, तपते बुन्देलखण्ड की चीख कौन सुनेगा ❓
*रेत-ज़मीन-शराब में उलझे नेता, तपते बुन्देलखण्ड की चीख कौन सुनेगा ❓*
*कटते जंगल, सूखती नदियाँ और 50 डिग्री की दहलीज़ पर पहुंचता बुन्देलखण्ड*
*रेगिस्तान बनने की ओर बढ़ता इलाका, सबसे बड़ा संकट गरीब और किसान पर*
✍🏻सत्यनिधि त्रिपाठी (संजू)
*सत्य एक्सप्रेस*
9425342614
बुन्देलखण्ड की धरती आज सिर्फ गर्म नहीं हो रही, बल्कि भीतर ही भीतर जल रही है। कभी पहाड़ों की हरियाली, घने जंगलों, कल-कल बहती नदियों और तालाबों के लिए पहचाना जाने वाला यह इलाका अब धीरे-धीरे पत्थरों, धूल और तपती हवाओं का प्रदेश बनता जा रहा है।
लेकिन सबसे भयावह बात यह है कि इस विनाश की आहट सत्ता के गलियारों तक पहुंच ही नहीं रही। नेताओं की प्राथमिकताएं जंगल बचाने, नदियों को पुनर्जीवित करने या किसानों को राहत देने की जगह रेत, जमीन और शराब ठेकों की राजनीति में उलझी दिखाई देती हैं।
बुन्देलखण्ड का तापमान हर साल नए रिकॉर्ड तोड़ रहा है। मई-जून की दोपहरें अब 48 से 50 डिग्री तक पहुंचने लगी हैं। खेतों में काम करने वाला किसान झुलस रहा है, मजदूरों की जिंदगी आग की भट्ठी बन चुकी है, लेकिन वातानुकूलित कमरों में बैठी व्यवस्था को यह तपिश महसूस नहीं होती।
जंगलों की अंधाधुंध कटाई ने प्रकृति का संतुलन बिगाड़ दिया है। जिन पहाड़ियों पर कभी हरियाली लहराती थी, वहां अब पत्थर और धूल उड़ती दिखाई देती है। अवैध खनन ने पहाड़ों के शीश और नदियों की छाती छलनी कर दी है। केन, धसान, बेतवा और उर्मिल जैसी नदियाँ गर्मियों में दम तोड़ती नजर आती हैं। तालाब और कुएँ सूख रहे हैं, भूजल लगातार नीचे जा रहा है।
विशेषज्ञ वर्षों से चेतावनी देते रहे हैं कि यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले समय में बुन्देलखण्ड का बड़ा हिस्सा रेगिस्तानी स्वरूप लेने लगेगा। लगातार घटती हरियाली, कम होती बारिश और बढ़ती गर्मी इस खतरे को और गंभीर बना रही है।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिन किसानों और गरीबों की जमीन, पानी और भविष्य दांव पर लगा है, वही सबसे ज्यादा उपेक्षित हैं। गांवों में पानी के लिए संघर्ष बढ़ रहा है, फसलें सूख रही हैं, पशु-पक्षी तक बेहाल हैं। युवा रोज़गार के लिए पलायन कर रहे हैं और गांव धीरे-धीरे खाली होते जा रहे हैं।
बुन्देलखण्ड आज विकास नहीं, संरक्षण मांग रहा है। उसे भाषण नहीं, पेड़ चाहिए। उसे घोषणाएं नहीं, बचती हुई नदियाँ चाहिए। वरना वह दिन दूर नहीं जब यह धरती सिर्फ इतिहास में *“हरियाली वाला बुन्देलखण्ड”* कहलाकर रह जाएगी।

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