काल कोठरी में जन्मी मुहब्बत, महिला पुलिस अधिकारी ने उम्रकैद की सजा काट चुके पूर्व कैदी संग लिए सात फेरे
*काल कोठरी में जन्मी मुहब्बत, महिला पुलिस अधिकारी ने उम्रकैद की सजा काट चुके पूर्व कैदी संग लिए सात फेरे*
✍🏻 सत्यनिधि त्रिपाठी (संजू)
*सत्य एक्सप्रेस*
छतरपुर । सलाखों के पीछे जहाँ अक्सर चीखें, सजा और गुनाहों की कहानियाँ जन्म लेती हैं, वहीं मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले में जेल की उन्हीं ऊँची दीवारों के बीच एक ऐसी मोहब्बत पनपी जिसने मजहब, समाज और अतीत की तमाम बंदिशों को तोड़ दिया। कानून की रखवाली करने वाली एक मुस्लिम महिला जेल अधिकारी ने उम्रकैद की सजा काट चुके हिंदू युवक का हाथ थामकर यह साबित कर दिया कि प्रेम न जात देखता है, न धर्म और न ही इंसान के बीते हुए कल का हिसाब रखता है।
सतना केंद्रीय जेल में पदस्थ सहायक जेल अधीक्षक फिरोजा खातून और हत्या के मामले में सजा काट चुके धर्मेंद्र सिंह की यह प्रेम कहानी आज पूरे बुंदेलखंड में चर्चा का विषय बनी हुई है। एक तरफ वर्दी की जिम्मेदारी थी, दूसरी तरफ दिल का रिश्ता लेकिन आखिरकार मोहब्बत ने हर दीवार गिरा दी। इतना ही नहीं, जब अपने ही इस रिश्ते से दूर हो गए, तब बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने आगे आकर कन्यादान कर इंसानियत और सामाजिक सौहार्द की अनोखी मिसाल पेश की।
*गुनाह, सजा और फिर मोहब्बत की दस्तक*
वर्ष 2007 के एक हत्याकांड में धर्मेंद्र सिंह को उम्रकैद की सजा हुई थी। जेल की कालकोठरी में वह अपने अपराध की सजा काट रहे थे, जबकि फिरोजा खातून उसी जेल में सहायक जेल अधीक्षक के रूप में तैनात थीं। जेल के वारंट और प्रशासनिक कार्यों के दौरान दोनों का आमना-सामना होता रहा।
धीरे-धीरे औपचारिक बातचीत अपनापन में बदली और फिर यह रिश्ता दिलों तक जा पहुँचा। धर्मेंद्र ने जेल में 14 साल बिताए और करीब चार साल पहले रिहा हुए, लेकिन जेल की दीवारों के भीतर जन्मा यह रिश्ता बाहर की दुनिया में भी कायम रहा।
*वर्दी से ऊपर दिल का फैसला*
फिरोजा खातून के सामने सबसे बड़ी चुनौती समाज और परिवार का विरोध था। एक ओर उनका पद और जिम्मेदारी थी, दूसरी ओर वह व्यक्ति था जिसे समाज एक अपराधी की नजर से देखता था। लेकिन फिरोजा ने धर्मेंद्र के वर्तमान को देखा, उसके प्रायश्चित को समझा और उसे जीवनसाथी के रूप में स्वीकार कर लिया।
दोनों ने छतरपुर जिले के लवकुशनगर के एक मैरिज गार्डन में वैदिक रीति-रिवाजों से सात फेरे लिए। शादी में सबसे भावुक पल तब आया जब बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने पिता और भाई की भूमिका निभाते हुए फिरोजा का कन्यादान किया।
*मोहब्बत ने तोड़ी मजहब की दीवार*
यह शादी सिर्फ दो दिलों का मिलन नहीं, बल्कि सामाजिक सौहार्द और इंसानियत का ऐसा संदेश बन गई है जिसकी चर्चा अब पूरे क्षेत्र में हो रही है। लोगों का कहना है कि जहाँ कानून ने धर्मेंद्र को सजा देकर सुधारने का काम किया, वहीं फिरोजा के प्रेम ने उसे जिंदगी को नए सिरे से जीने का हौसला दिया।
यह कहानी साबित करती है कि अगर इंसान का पश्चाताप सच्चा हो और प्रेम निस्वार्थ, तो समाज की सबसे मजबूत दीवारें भी ढह जाती हैं।

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