कागजों में बच्चों का पोषण, जमीन पर भ्रष्टाचारियों का राशन पर डाका
*पोषण योजना का माफिया मॉडल!*
*कागजों में बच्चों का पोषण, जमीन पर भ्रष्टाचारियों का राशन पर डाका*
*स्व-सहायता समूहों के नाम पर ठेकेदारों का सिंडिकेट, गुड़-चिक्की से लेकर नियुक्तियों तक लाखों-करोड़ों के खेल के आरोप*
✍🏻 सत्यनिधि त्रिपाठी (संजू)
*सत्य एक्सप्रेस*
छतरपुर। जिले में बच्चों और गर्भवती महिलाओं के पोषण के लिए संचालित की जा रही सरकारी पोषण आहार योजना अब जनहित की नहीं, बल्कि कथित तौर पर कमीशनखोरी, फर्जीवाड़े और संगठित लूट के बड़े मॉडल के रूप में सामने आती दिख रही है।
महिला एवं बाल विकास विभाग के अंतर्गत संचालित बक्स्वाहा, बड़ा मलहरा सहित अन्य परियोजनाओं से जो शिकायतें और दस्तावेजी संकेत निकलकर सामने आ रहे हैं, वे सिर्फ अनियमितता नहीं बल्कि पूरे सिस्टम के मैनेज होकर चलने की कहानी बयां कर रहे हैं।
*❓बच्चों के नाम पर भेजा गया पोषण आहार आखिर किसके गोदाम में उतरा?*
*❓स्व-सहायता समूहों के खाते में गई सरकारी राशि आखिर किसके इशारे पर निकली?*
*❓आंगनबाड़ी केंद्रों तक नहीं पहुंची सामग्री के बिल आखिर किसकी मेहरबानी से पास हुए?*
ये वे सवाल हैं, जिनका जवाब अब पूरा जिला जानना चाहता है।
*महिलाओं के सशक्तिकरण की योजना बनी ठेकेदारों की कमाई का जरिया*
सरकार ने स्व-सहायता समूहों को इसलिए जोड़ा था ताकि ग्रामीण महिलाएं रोजगार से जुड़ें, आत्मनिर्भर बनें और स्थानीय स्तर पर पोषण सामग्री तैयार कर बच्चों तक पहुंचाएं।
लेकिन छतरपुर जिले में इस योजना की जमीनी तस्वीर बेहद भयावह बताई जा रही है।
गंभीर आरोप यह है कि प्रभावशाली ठेकेदारों ने कई स्व-सहायता समूहों को महज 5 हजार रुपये मासिक या मामूली कमीशन देकर उनके नाम, बैंक खाते, रजिस्ट्रेशन दस्तावेज और संचालन अधिकार अपने कब्जे में ले लिए।
यानि कागजों में महिलाएं सप्लायर हैं, लेकिन असल सप्लाई और भुगतान का पूरा नियंत्रण ठेकेदार नेटवर्क के हाथ में है।
इस मॉडल में महिलाओं को सिर्फ नाम के लिए आगे रखा गया, जबकि पीछे से सरकारी भुगतान की मोटी रकम कथित तौर पर कुछ चुनिंदा लोगों के बीच बांटी जाती रही।
यह स्थिति योजना के मूल उद्देश्य—महिला सशक्तिकरण—को ही मजाक में बदलती नजर आ रही है।
*‘5 हजार में नाम किराए’ का सनसनीखेज आरोप, समूह बने भ्रष्टाचार का मोहरा*
सूत्रों के अनुसार कई समूहों की संचालिकाओं को यह तक पता नहीं कि उनके नाम से कितनी सप्लाई दिखाई गई, कितने बिल लगे और कितनी राशि निकाली गई।
उन्हें सिर्फ हस्ताक्षर कराने, चेक पर दस्तखत लेने या बैंक प्रक्रिया के नाम पर बुलाया जाता है।
कथित तौर पर पूरा खेल इस फार्मूले पर चलता है—
“समूह का नाम हमारा, काम ठेकेदार का, भुगतान विभाग से, और हिस्सेदारी ऊपर तक।”
यदि यह आरोप सही साबित होते हैं तो यह सिर्फ वित्तीय गड़बड़ी नहीं, बल्कि सरकारी योजनाओं के नाम पर गरीब महिलाओं की पहचान का दुरुपयोग है।
*गुड़-चिक्की बना पोषण नहीं, करोड़ों की निकासी का हथियार*
सबसे ज्यादा चौंकाने वाले आरोप गुड़ और चिक्की सप्लाई को लेकर सामने आए हैं।
बक्स्वाहा और बड़ा मलहरा परियोजनाओं में जनवरी और फरवरी माह के दौरान आंगनबाड़ी केंद्रों के लिए गुड़-चिक्की की भारी सप्लाई दर्शाते हुए बड़े-बड़े बिल पास किए गए।
लेकिन जमीनी स्तर पर कई केंद्रों से जो शिकायतें निकल रही हैं, वे हैरान करने वाली हैं—
📌कई केंद्रों पर नियमित सप्लाई नहीं पहुंची,
📌कुछ जगह नाममात्र की सामग्री दी गई,
📌कई कार्यकर्ताओं को वितरण रजिस्टर भरने का दबाव बताया जा रहा है,
जबकि रिकॉर्ड में बच्चों को पूर्ण वितरण दिखा दिया गया।
📌यानी कागजों में बच्चों ने पोषण खा लिया, मगर हकीकत में राशन रास्ते में ही गायब हो गया।
यदि स्टॉक रजिस्टर, वितरण पंजियां, वाहन परिवहन विवरण और केंद्रवार भौतिक सत्यापन कराया जाए, तो लाखों नहीं बल्कि करोड़ों की वित्तीय गड़बड़ी सामने आने की आशंका जताई जा रही है।
*फर्जी बिलों से सरकारी खजाने पर सीधा हमला?*
विभागीय दस्तावेजों की प्रारंभिक पड़ताल में यह सवाल सबसे बड़ा बनकर उभर रहा है कि—
*❓जब सामग्री केंद्रों तक नहीं पहुंची, तो भुगतान किन आधारों पर हुआ?*
*❓बिल किसने सत्यापित किए?*
*❓रसीदें किसने लगाईं?*
*❓और स्टॉक एंट्री किसके निर्देश पर पूरी दिखाई गई?"*
इससे साफ संकेत मिलते हैं कि मामला सिर्फ सप्लायर स्तर का नहीं हो सकता।
बिना विभागीय मिलीभगत के फर्जी बिलों का भुगतान संभव नहीं माना जा रहा।
सरकारी खजाने से निकली हर राशि पर आखिर किसने अनुमोदन की मुहर लगाई—अब यह जांच का सबसे अहम बिंदु बन चुका है।
*महिला बाल विकास अधिकारी दिनेश दीक्षित पर उठे बड़े सवाल*
इस पूरे मामले में विभाग के जिम्मेदार अधिकारी और रिटायरमेंट की दहलीज पर खड़े महिला बाल विकास अधिकारी दिनेश दीक्षित की भूमिका चर्चा के केंद्र में है।
विभागीय सूत्रों का साफ कहना है कि इतनी बड़ी मात्रा में सप्लाई स्वीकृति, भुगतान, सत्यापन और फाइल मूवमेंट बिना शीर्ष स्तर की जानकारी के संभव ही नहीं।
यही वजह है कि अब सवाल सीधे अधिकारी की कार्यप्रणाली पर उठ रहे हैं—
❓क्या यह सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही है?
या फिर सुनियोजित संरक्षण में चल रहा आर्थिक खेल?
❓क्या विभागीय निगरानी जानबूझकर कमजोर रखी गई?
इन सवालों का जवाब दिए बिना विभाग की साख बच पाना मुश्किल दिख रहा है।
आंगनवाड़ी नियुक्तियों में भी ‘रेट फिक्स’ का आरोप, नौकरी के नाम पर वसूली की चर्चा
पोषण आहार की सप्लाई तक सीमित न रहकर आरोप अब आंगनवाड़ी केंद्रों पर हुई हालिया नियुक्तियों तक पहुंच गए हैं।
सूत्र बताते हैं कि महिला बाल विकास अधिकारी दिनेश दीक्षित के कार्यकाल में कई नियुक्तियों में ‘सेटिंग’, ‘सिफारिश’ और ‘रेट तय’ होने की चर्चाएं खुलकर विभागीय गलियारों में होती रहीं।
कहा जा रहा है कि—
पात्रता से ज्यादा पहुंच को महत्व दिया गया,
अभ्यर्थियों से मोटी रकम दलालों के माध्यम से ली गई,
और जिले के दूसरे नंबर पर बैठे एक अधिकारी तक हिस्सेदारी पहुंचने की चर्चाएं भी जोर पकड़ रही हैं।
यदि नियुक्ति फाइलों, चयन सूची, आपत्तियों और अभ्यर्थियों के बयानों की निष्पक्ष जांच कराई जाए, तो भर्ती प्रक्रिया भी बड़े घोटाले का हिस्सा साबित हो सकती है।
*भुगतान से भर्ती तक… क्या विभाग में बना हुआ है पूरा सिंडिकेट?*
एक तरफ पोषण सामग्री सप्लाई के नाम पर फर्जी बिल,
दूसरी तरफ स्व-सहायता समूहों के नाम का दुरुपयोग,
तीसरी तरफ नियुक्तियों में पैसों के लेन-देन के आरोप—
इन सबको जोड़कर देखा जाए तो मामला अलग-अलग घटनाओं का नहीं, बल्कि महिला एवं बाल विकास विभाग के भीतर जड़ जमा चुके एक कथित सिंडिकेट का संकेत देता है।
❓यह सिंडिकेट किस स्तर तक फैला है?
❓कौन सप्लायर है?
❓कौन फाइल क्लियर करता है?
❓कौन भुगतान पास करता है?
❓और किसके संरक्षण में सब चुप हैं?
यही अब सबसे बड़ा सवाल बन गया है।
*विभाग की चुप्पी ने बढ़ाए संदेह, जवाब देने को कोई तैयार नहीं*
इतने गंभीर आरोपों के बाद भी विभाग की ओर से न तो कोई स्पष्ट खंडन सामने आया है और न ही किसी आंतरिक जांच की औपचारिक घोषणा।
यह खामोशी ही अब संदेह को और गहरा कर रही है।
सवाल यह है कि यदि -
❓सब कुछ नियमपूर्वक हुआ है तो विभाग खुलकर सामने क्यों नहीं आता?
❓स्टॉक रजिस्टर सार्वजनिक क्यों नहीं किए जाते?
❓सप्लाई सूची और भुगतान का खुलासा क्यों नहीं होता?
❓नियुक्तियों की पारदर्शी समीक्षा क्यों नहीं कराई जाती?
चुप्पी अक्सर वहां ज्यादा होती है, जहां फाइलों में बहुत कुछ दबा होता है।
*मुख्यमंत्री की मंशा पर जमीनी स्तर पर पानी फेर रहा सिस्टम*
राज्य सरकार बच्चों के कुपोषण को खत्म करने, महिलाओं को रोजगार देने और आंगनबाड़ी व्यवस्था को मजबूत करने के दावे करती है।
मुख्यमंत्री मोहन यादव की योजनाओं का उद्देश्य भी यही है कि अंतिम पंक्ति के हितग्राही तक लाभ पहुंचे।
लेकिन यदि छतरपुर में पोषण योजना इस तरह कागजी बिलों, ठेकेदारों और कथित वसूली तंत्र में फंस गई है, तो यह सिर्फ विभागीय लापरवाही नहीं बल्कि शासन की मंशा को जमीन पर नष्ट करने जैसा मामला है।
*निष्पक्ष जांच हुई तो हिल सकता है पूरा अमला*
विभागीय सूत्रों का मानना है कि यदि निम्न बिंदुओं पर स्वतंत्र जांच बैठा दी जाए तो पूरे मामले की असल तस्वीर सामने आ सकती है—
🔴बक्स्वाहा, बड़ा मलहरा सहित सभी परियोजनाओं के स्टॉक रजिस्टर
🔴जनवरी से अब तक के गुड़-चिक्की सप्लाई बिल
परिवहन एवं वितरण रिकॉर्ड
🔴स्व-सहायता समूहों के बैंक खातों का ऑडिट
🔴भुगतान स्वीकृति फाइलें
हालिया आंगनवाड़ी नियुक्तियों की चयन प्रक्रिया
🔴संबंधित अधिकारियों की भूमिका
इन दस्तावेजों का क्रॉस वेरिफिकेशन कई चेहरों से नकाब हटा सकता है।
❓अब सवाल—कार्रवाई होगी या फिर फाइलों में दब जाएगा पोषण का यह घोटाला?
बच्चों के हिस्से का पोषण,
महिलाओं के नाम की योजना,
सरकारी खजाने का पैसा—
यदि इन तीनों पर संगठित तरीके से डाका डाला गया है तो यह सामान्य अनियमितता नहीं, बल्कि संवेदनशील योजनाओं के साथ विश्वासघात है।
अब निगाहें प्रशासन पर हैं।
❓क्या कलेक्टर स्तर से उच्चस्तरीय जांच होगी?
❓क्या जिम्मेदार अधिकारी और सप्लायरों पर शिकंजा कसेगा?
❓या फिर यह मामला भी कुछ नोटिंग, कुछ दबाव और कुछ सेटिंग के बीच दफन कर दिया जाएगा?
फिलहाल इतना तय है—यदि इस पोषण योजना की फाइलें सचमुच खुलीं, तो कई चेहरे बेनकाब होना तय है।

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