छतरपुर–पन्ना सीमा पर आदिवासियों का ऐतिहासिक “मिट्टी सत्याग्रह”

केन नदी में उतरकर शरीर पर मिट्टी लपेटा, विस्थापन के खिलाफ उग्र हुआ आंदोलन

🔴 आंदोलन ने लिया भावुक और निर्णायक मोड़

सत्यनिधि त्रिपाठी (संजू)
सत्य एक्सप्रेस 

छतरपुर। मध्यप्रदेश के छतरपुर और पन्ना जिले की सीमा पर प्रस्तावित केन-बेतवा लिंक परियोजना के विरोध में विस्थापित आदिवासियों का आंदोलन अब अपने सबसे संवेदनशील और निर्णायक चरण में पहुंच गया है। आंदोलन के 9वें दिन और सामूहिक भूख हड़ताल के 48 घंटे पूरे होते ही यह संघर्ष “मिट्टी सत्याग्रह” में बदल गया, जिसने पूरे क्षेत्र का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है।
🌊 केन नदी बनी संघर्ष का केंद्र
आज सुबह हजारों की संख्या में आदिवासी, महिलाएं और बच्चे केन नदी में उतरे। उन्होंने नदी की गीली मिट्टी को अपने पूरे शरीर पर लपेट लिया और जलधारा के बीच खड़े होकर विरोध दर्ज कराया।
प्रदर्शनकारियों का यह प्रतीकात्मक कदम इस बात का संदेश था कि उनका अस्तित्व इस मिट्टी से जुड़ा है और वे बिना न्याय के अपनी जमीन छोड़ने को तैयार नहीं हैं।
✊ “मिट्टी में मिल जाएंगे, पर जमीन नहीं छोड़ेंगे”
आंदोलनकारियों ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वे इस भूमि के मूल निवासी हैं।
उनका कहना है कि यदि उन्हें जबरन बेदखल किया गया, तो वे इसी मिट्टी में समा जाना पसंद करेंगे, लेकिन अपनी जल, जंगल और जमीन को नहीं छोड़ेंगे।
यह नारा आंदोलन की पहचान बनता जा रहा है और लोगों के भीतर गहरी भावनात्मक ऊर्जा भर रहा है।
☀️ भीषण गर्मी में जारी “आकाश सत्याग्रह”
भीषण धूप और खुले आसमान के नीचे हजारों लोग “आकाश सत्याग्रह” कर रहे हैं।
भूख हड़ताल के चलते कई महिलाओं और बुजुर्गों की हालत गंभीर हो गई है।
लगातार 48 घंटे से चूल्हे नहीं जले हैं, जिससे आंदोलनकारियों की शारीरिक स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है।
⚠️ प्रशासन पर लापरवाही के आरोप
सामाजिक कार्यकर्ता और जय किसान संगठन से जुड़े अमित भटनागर ने प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए हैं।
उन्होंने कहा कि प्रशासन नियम-कानूनों (धारा 11, 15, 18) की अनदेखी करते हुए आदिवासियों को उजाड़ने की तैयारी में है, जबकि विस्थापन से पहले उनके अधिकारों और पुनर्वास की प्रक्रिया पूरी नहीं की गई है।
📢 चेतावनी: आंदोलन हो सकता है और उग्र
आंदोलनकारियों ने प्रशासन को चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही कोई उच्चाधिकारी मौके पर पहुंचकर ठोस निर्णय नहीं लेता, तो यह आंदोलन और अधिक उग्र रूप धारण करेगा।
उन्होंने साफ कहा है कि यह सिर्फ जमीन का मुद्दा नहीं, बल्कि अस्तित्व और सम्मान की लड़ाई है।
🌳 “जल, जंगल, जमीन” की निर्णायक लड़ाई
केन-बेतवा परियोजना से प्रभावित आदिवासी समुदाय इसे अपने अस्तित्व की लड़ाई मान रहा है।
उनका कहना है कि विकास के नाम पर उनकी संस्कृति, जीवनशैली और प्राकृतिक संसाधनों को खत्म किया जा रहा है।
छतरपुर और पन्ना की सीमा पर चल रहा यह “मिट्टी सत्याग्रह” अब केवल एक आंदोलन नहीं, बल्कि आदिवासी अस्मिता, अधिकार और न्याय की एक बड़ी लड़ाई बन चुका है।
यदि समय रहते समाधान नहीं निकाला गया, तो यह संघर्ष आने वाले दिनों में प्रदेश स्तर पर एक बड़े जनांदोलन का रूप ले सकता है।

न्यूज़ सोर्स : Mail