सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, देवंगना कलीता को केस के दस्तावेज देखने की नहीं मिली इजाजत
नई दिल्ली। दिल्ली दंगों से जुड़ी कथित साजिश के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्देश जारी किया है। अदालत ने दिल्ली उच्च न्यायालय के उस आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है, जिसके तहत आरोपी देवांगना कलीता को उन दस्तावेजों का निरीक्षण करने की अनुमति दी गई थी, जिन्हें अभियोजन पक्ष ने अपने साक्ष्य के रूप में शामिल नहीं किया है। इस मामले में शीर्ष अदालत ने दिल्ली पुलिस की याचिका को स्वीकार करते हुए कलीता को नोटिस जारी किया है और अब मामले की आगामी सुनवाई दो सप्ताह बाद होगी।
दस्तावेजों तक पहुंच और कानूनी विवाद
दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह तर्क रखा कि आरोप तय होने से पूर्व किसी आरोपी को ऐसे दस्तावेजों को देखने का अधिकार नहीं है, जो जांच एजेंसी द्वारा इस्तेमाल नहीं किए गए हैं। सुनवाई के दौरान अदालत ने ट्रायल में हो रही देरी पर भी चिंता व्यक्त की और टिप्पणी की कि यदि बहस इसी गति से चलती रही, तो कार्यवाही को पूरा होने में वर्षों लग जाएंगे। दूसरी ओर, देवांगना कलीता ने तर्क दिया था कि वर्ष 2020 के प्रदर्शनों के दौरान पुलिस द्वारा एकत्रित कुछ वीडियो और व्हाट्सऐप चैट में ऐसी सामग्री है, जो उनकी बेगुनाही साबित कर सकती है, क्योंकि पुलिस केवल चुनिंदा हिस्सों का उपयोग कर रही है।
उच्च न्यायालय का रुख और पारदर्शिता का सवाल
पूर्व में दिल्ली उच्च न्यायालय ने यह मानते हुए कि निष्पक्ष सुनवाई के लिए न्यायिक पारदर्शिता अनिवार्य है, कलीता को अन-रिलाइड (गैर-भरोसे वाले) दस्तावेजों के निरीक्षण की अनुमति दी थी। पुलिस का पक्ष था कि जांच अभी जारी है और कुछ आरोपी फरार हैं, इसलिए संवेदनशील जानकारी साझा करना जांच को प्रभावित कर सकता है। हालांकि, उच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया था कि पुलिस अधिकारियों की आंतरिक बातचीत साझा करना आवश्यक नहीं है, लेकिन अन्य दस्तावेजों को देखने का अधिकार आरोपी को मिलना चाहिए। वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद यह आदेश प्रभावी नहीं रहेगा।
संवैधानिक प्रक्रिया और भविष्य की सुनवाई
यह पूरा मामला फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों से संबंधित है, जिसमें 53 लोगों की जान गई थी और भारी संख्या में लोग घायल हुए थे। इस मामले में देवांगना कलीता, नताशा नरवाल, उमर खालिद और ताहिर हुसैन सहित कई लोगों पर यूएपीए के तहत गंभीर आरोप दर्ज हैं। सुप्रीम कोर्ट अब यह तय करेगा कि आरोपी को अभियोजन द्वारा इस्तेमाल नहीं किए गए दस्तावेजों तक पहुंच पाने का कानूनी अधिकार है या नहीं। इस कानूनी व्याख्या के बाद ही ट्रायल की आगे की दिशा स्पष्ट हो सकेगी।

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