अवैध खनन पर हाई कोर्ट की बड़ी कार्रवाई, 16 खदानों का संचालन रोका; अधिकारियों को फटकार
ग्वालियर। मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिले के बिलौआ-रफादपुर क्षेत्र में कथित अवैध उत्खनन और करोड़ों रुपये की रॉयल्टी चोरी के मामले में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने बेहद सख्त रुख अख्तियार किया है। जस्टिस जी.एस. अहलूवालिया और जस्टिस अनुराधा शुक्ला की युगलपीठ ने क्षेत्र की 16 खदानों में तत्काल प्रभाव से सभी प्रकार की खनन गतिविधियों पर पूरी तरह से रोक लगाने का ऐतिहासिक आदेश जारी किया है। इसके साथ ही अदालत ने इस मामले में ढुलमुल रवैया अपनाने वाले जिम्मेदार अधिकारियों को आड़े हाथों लेते हुए गंभीर टिप्पणी की। कोर्ट ने दोटूक शब्दों में कहा कि सरकारी अधिकारियों को जनता की गाढ़ी कमाई के टैक्स से वेतन मिलता है, लेकिन उनकी कार्यप्रणाली देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो वे सरकारी खजाने के बजाय खनन माफिया के हितों को सुरक्षित करने में लगे हुए हैं।
भ्रामक रिपोर्ट सौंपने पर एसडीएम को अवमानना का नोटिस
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने डबरा के अनुविभागीय अधिकारी (एसडीएम) रुपेश रतन सिंघई की कार्यशैली पर गहरी नाराजगी व्यक्त की। कोर्ट ने पाया कि प्रशासनिक अधिकारी ने धरातल पर जाकर वास्तविक स्थिति की जांच किए बिना ही अदालत में एक बेहद भ्रामक और जमीनी हकीकत से परे रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी थी। इस कृत्य को न्यायालय को गुमराह करने की कोशिश मानते हुए पीठ ने एसडीएम के खिलाफ अवमानना की कानूनी कार्यवाही शुरू करने के कड़े निर्देश जारी किए हैं। इसके साथ ही ग्वालियर कलेक्टर रुचिका चौहान को सचेत करते हुए पूरे जिले में अवैध खनन गतिविधियों को पूरी तरह से बंद कराने और कानून व्यवस्था बहाल करने की व्यक्तिगत जिम्मेदारी सौंपी गई है।
करोड़ों की रॉयल्टी वसूली में लेटलतीफी पर कड़ा ऐतराज
न्यायालय के समक्ष सुनवाई के दौरान यह चौंकाने वाला तथ्य भी उजागर हुआ कि वर्ष 2017 में खनन माफियाओं को जारी किए गए करोड़ों रुपये की रॉयल्टी और जुर्माने के नोटिसों पर प्रशासनिक अधिकारियों ने पिछले कई वर्षों से कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया। वसूली की इस सुस्त रफ्तार और फाइलों को दबाकर बैठने की प्रवृत्ति पर तीखा प्रहार करते हुए माननीय न्यायाधीशों ने संबंधित अधिकारियों की तुलना 'कुंभकर्णी नींद' से की। कोर्ट ने कड़े लहजे में सवाल पूछा कि आखिर इतने लंबे समय से यह पूरी कानूनी प्रक्रिया किसके दबाव में और क्यों लंबित रखी गई थी, जिससे राजस्व को भारी नुकसान हुआ।
सीसीटीवी कैमरों की मॉनिटरिंग पर खुली पोल
सुनवाई के दौरान जब ग्वालियर जिला कलेक्टर ने कोर्ट को आश्वस्त करने का प्रयास किया कि अवैध परिवहन को रोकने के लिए सभी ई-चेक पोस्टों पर आधुनिक सीसीटीवी कैमरे स्थापित किए गए हैं, तो कोर्ट ने उनके दावों की गहराई से पड़ताल की। अदालत ने जब माइनिंग विभाग के जिम्मेदार अधिकारी से इन सीसीटीवी कैमरों की नियमित निगरानी और बैकअप के संबंध में तीखे सवाल पूछे, तो अधिकारी ने कोर्ट के समक्ष यह बात स्वीकार की कि इन कैमरों की लगातार मॉनिटरिंग के लिए कोई ठोस व्यवस्था नहीं बनाई गई थी। इस जवाब से कोर्ट में सरकारी दावों की जमीनी हकीकत उजागर हो गई।
सीसीटीवी फुटेज जब्त करने और लीज नवीनीकरण पर जवाब तलब
सरकारी दावों की पोल खुलने के बाद हाईकोर्ट ने बेहद कड़ा कदम उठाते हुए सभी ई-चेक पोस्टों के डीवीआर और सीसीटीवी फुटेज को तत्काल प्रभाव से जब्त करने के आदेश दिए हैं। प्रशासन को हिदायत दी गई है कि वे 17 जुलाई को होने वाली अगली सुनवाई में इन सभी सबूतों को सीलबंद लिफाफे में सीधे अदालत के समक्ष पेश करें। न्यायालय ने साफ चेतावनी दी है कि यदि किसी भी कैमरे की रिकॉर्डिंग गायब मिली या उसके साथ कोई छेड़छाड़ पाई गई, तो इसे अदालत से सबूत नष्ट करने का प्रयास माना जाएगा और संबंधित अधिकारियों पर कड़ी फौजदारी कार्रवाई होगी। इसके साथ ही कोर्ट ने नो-ड्यूज सर्टिफिकेट के बिना ही कई खदानों की लीज का गैर-कानूनी ढंग से रिन्यूअल करने के फैसले पर भी विस्तृत जवाब तलब किया है।

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