वन विभाग की बड़ी कार्रवाई, AI से बने फर्जी TP के साथ खैर लकड़ी का बड़ा जखीरा पकड़ा
रायपुर: छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में वन विभाग ने कीमती लकड़ी की अवैध तस्करी करने वाले एक बहुत बड़े और हाईटेक गिरोह का पर्दाफाश किया है। राज्य उड़नदस्ता दल (विजिलेंस टीम) ने मंगलवार की तड़के एक गुप्त सूचना के आधार पर छापेमारी करते हुए एक निजी यार्ड से करीब 50 टन अवैध खैर की लकड़ी के भारी-भरकम गोले बरामद किए हैं। शुरुआती तफ्तीश में यह सनसनीखेज खुलासा हुआ है कि इस कीमती लकड़ी को पड़ोसी राज्य ओडिशा से जाली कागजातों के सहारे रायपुर लाया गया था। इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि तस्करों ने वन विभाग की आंखों में धूल झोंकने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) तकनीक का इस्तेमाल कर हूबहू नकली दस्तावेज तैयार किए थे।
मास्टरमाइंड मनीष अग्रवाल मौके से फरार, डिजिटल सबूतों के साथ 3 मुंशी हिरासत मे
वन विभाग के आला अधिकारियों ने बताया कि छापेमारी की भनक लगते ही इस पूरे रैकेट का मुख्य सूत्रधार मनीष अग्रवाल अंधेरे का फायदा उठाकर मौके से भागने में कामयाब रहा। हालांकि, मुस्तैद टीम ने यार्ड में मौजूद उसके मुंशी सहित तीन अन्य कर्मचारियों को घेराबंदी कर हिरासत में ले लिया है, जिनसे गुप्त स्थान पर कड़ी पूछताछ की जा रही है। जांच अधिकारियों ने मौके से आरोपियों के मोबाइल फोन और इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स भी अपने कब्जे में ले लिए हैं। इन उपकरणों की शुरुआती फॉरेंसिक जांच में कई महत्वपूर्ण डिजिटल साक्ष्य और व्हाट्सएप चैट हाथ लगी हैं, जो इस गिरोह के बड़े कारनामों की गवाही दे रही हैं।
पकड़े जाने से बचने के लिए एआई तकनीक से तैयार होते थे जाली ट्रांजिट पास
जांच में यह बात खुलकर सामने आई है कि आरोपी मनीष अग्रवाल एआई (AI) टूल्स और आधुनिक सॉफ्टवेयर का उपयोग करने में माहिर है। वह ओडिशा, छत्तीसगढ़, हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे कई राज्यों के वन विभागों के आधिकारिक ट्रांजिट पास (TP) और सरकारी सील को कंप्यूटर पर हूबहू कॉपी कर लेता था। एआई से तैयार ये दस्तावेज इतने असली लगते थे कि नाकों पर तैनात सुरक्षाकर्मियों को कभी कोई शक ही नहीं हुआ। इन्हीं नकली कागजों के दम पर लकड़ी की खेप बिना किसी रुकावट के एक राज्य से दूसरे राज्य की सीमाओं को पार कर जाती थी। वन विभाग अब इस बात की गहराई से तफ्तीश कर रहा है कि इस तकनीकी धोखाधड़ी में विभाग का कोई अंदरूनी कर्मचारी शामिल है या नहीं।
ओडिशा से रायपुर, फिर यूपी-हरियाणा के रास्ते नेपाल तक जुड़े थे तस्करी के तार
तस्करों का यह संगठित जाल सिर्फ छत्तीसगढ़ या पड़ोसी राज्यों तक ही सीमित नहीं था, बल्कि इसके तार अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं से जुड़े हुए हैं। प्राथमिक जांच के मुताबिक, आरोपी पहले ओडिशा के जंगलों से खैर की लकड़ी कटवाकर रायपुर के डंपिंग यार्ड में लाता था। यहाँ से बड़ी गाड़ियों के जरिए माल को हरियाणा और उत्तर प्रदेश के रास्ते सीधे नेपाल बॉर्डर पार कराया जाता था। अधिकारियों को अंदेशा है कि नेपाल पहुंचने के बाद इस बेशकीमती लकड़ी को ऊंचे दामों पर अन्य विदेशी बाजारों और अंतरराष्ट्रीय तस्करों को सप्लाई किया जाता था।
पुराना शातिर अपराधी है मनीष, वन्यजीव तस्करी और अदालत में कई मामले हैं दर्ज
सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक, फरार मुख्य आरोपी मनीष अग्रवाल वन अपराधों की दुनिया का एक पुराना और आदतन अपराधी है। इससे पहले साल 2021 में भी वन विभाग ने उसे भारी मात्रा में खैर की अवैध लकड़ी के साथ दबोचा था। इतना ही नहीं, वर्ष 2019-20 में वन्यजीवों के अंगों की तस्करी यानी तेंदुए की खाल के अवैध धंधे में भी उसकी गिरफ्तारी हो चुकी है। लकड़ी की अवैध कटाई और तस्करी से जुड़े उसके कई गंभीर मुकदमे वर्तमान में भी माननीय न्यायालय में विचाराधीन हैं, जिनमें वह जमानत पर बाहर चल रहा था।
आखिर क्यों इतनी बेशकीमती और डिमांड में रहती है खैर की लकड़ी?
पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, खैर (Acacia catechu) की लकड़ी व्यापारिक रूप से बेहद मूल्यवान मानी जाती है। इसका मुख्य उपयोग पान और गुटखे में इस्तेमाल होने वाले उच्च गुणवत्ता के 'कत्था' के निर्माण में किया जाता है। इसके अलावा, इसकी छाल और जड़ों का उपयोग कई तरह की आयुर्वेदिक व पारंपरिक औषधियां बनाने में होता है। पुराने और परिपक्व खैर के पेड़ों के तने से एक विशेष औषधीय तत्व निकलता है जिसे 'खैरसाल' कहा जाता है, जिसकी कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में आसमान छूती है। इसी भारी मुनाफे के चक्कर में संगठित माफिया हमेशा इस लकड़ी को अपने निशाने पर रखते हैं।
अंतर-राज्यीय स्तर पर जांच तेज, फरार आरोपी की तलाश में टीमें रवाना
वन विभाग ने जब्त की गई 50 टन खैर की लकड़ी को राजसात करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। अधिकारियों का कहना है कि मोबाइल से मिले डिजिटल इनपुट्स के आधार पर गिरोह के अन्य सदस्यों की धरपकड़ के लिए जाल बिछा दिया गया है। फरार मास्टरमाइंड मनीष अग्रवाल की तलाश में पुलिस और वन विभाग की संयुक्त टीमें संभावित ठिकानों पर दबिश दे रही हैं। मामले के अंतर-राज्यीय और अंतर्राष्ट्रीय कनेक्शन को देखते हुए छत्तीसगढ़ पुलिस अन्य राज्यों की सुरक्षा व खुफिया एजेंसियों के साथ भी इस केस की केस डायरी साझा कर रही है।

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