रायपुर: छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में बिजली विभाग की रीढ़ कहे जाने वाले संविदा कर्मचारियों का आक्रोश फूट पड़ा है। विद्युत विभाग में कार्यरत 2,471 से भी अधिक संविदा कर्मचारियों ने अपनी एकमात्र और प्रमुख मांग को लेकर अनिश्चितकालीन हड़ताल का बिगुल फूंक दिया है। आंदोलनकारी कर्मचारी नवा रायपुर स्थित तूता धरना स्थल पर तंबू गाड़कर लगातार उग्र प्रदर्शन कर रहे हैं। कर्मचारियों की साफ मांग है कि विभाग में खाली पड़े रिक्त पदों पर उनका नियमित समायोजन (नियमितीकरण) किया जाए। आंदोलनकारियों का आरोप है कि वे पिछले कई सालों से नियमित कर्मचारियों की तरह ही जान जोखिम में डालकर लगातार अपनी सेवाएं दे रहे हैं, लेकिन शासन और प्रशासन द्वारा उनके भविष्य को सुरक्षित करने के लिए अब तक स्थायी नियुक्ति का कोई ठोस लाभ नहीं दिया गया है।

संविदा कर्मचारी संघ ने सरकार को कड़े शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि उनकी जायज मांगों पर तत्काल सकारात्मक फैसला नहीं लिया गया, तो इस आंदोलन को पूरे प्रदेश में और उग्र किया जाएगा। इसी कड़ी में अपनी मांग मनवाने के लिए कर्मचारियों ने सामूहिक 'जल समाधि आंदोलन' करने की भी आत्मघाती घोषणा कर दी है, जिससे प्रशासनिक अमले में हड़कंप मच गया है।

जान हथेली पर रखकर वर्षों से कर रहे हैं हाई-वोल्टेज काम

धरना स्थल पर मौजूद संविदा बिजली कर्मचारियों का कहना है कि जब उनकी भर्ती की गई थी, तब उन्हें केवल सामान्य मैदानी और तकनीकी सहायता कार्यों की जिम्मेदारी देने की बात कही गई थी। लेकिन धीरे-धीरे विभाग ने उन पर काम का दबाव बढ़ाते हुए हाई वोल्टेज (HT) और लो वोल्टेज (LT) लाइनों पर चढ़कर फॉल्ट सुधारने जैसे अत्यधिक खतरनाक और जोखिमपूर्ण कार्य सौंप दिए। कर्मचारियों का आरोप है कि जब काम और जिम्मेदारियां पूरी तरह से नियमित कर्मचारियों जैसी ली जा रही हैं, तो उनके अधिकार, सुविधाएं और वेतन उस स्तर का क्यों नहीं है? उन्हें आज भी नाममात्र के मानदेय पर काम करने के लिए मजबूर किया जा रहा है।

हादसों का गढ़ बना विभाग: 43 कर्मचारी गंवा चुके हैं जान

आंदोलनकारी नेताओं ने बिजली कंपनियों की लापरवाही को उजागर करते हुए कुछ बेहद डरावने आंकड़े पेश किए हैं:

  • 100 से अधिक हादसे: पिछले कुछ वर्षों में बिजली विभाग की लचर सुरक्षा व्यवस्था के कारण ड्यूटी के दौरान लगभग 100 से ज्यादा संविदा कर्मचारी गंभीर हादसों का शिकार हो चुके हैं।

  • 43 मौतें: इन दर्दनाक हादसों में अब तक कुल 43 संविदा कर्मचारियों की अकाल मौत हो चुकी है, जबकि दर्जनों कर्मचारी हमेशा के लिए अपंग हो गए।

  • मुआवजे के लिए भी संघर्ष: कर्मचारियों का कहना है कि ड्यूटी पर जान गंवाने के बाद भी पीड़ित परिवारों को अनुकंपा नियुक्ति या उचित आर्थिक सहायता दिलाने के लिए उनके साथियों को बार-बार सड़कों पर उतरकर आंदोलन करना पड़ता है, जो कि बेहद शर्मनाक है।

नई एचआर (HR) नीति और नाममात्र के बीमे पर फूटा गुस्सा

कर्मचारियों ने बिजली कंपनी द्वारा हाल ही में लागू की गई नई एचआर नीति पर भी गंभीर सवालिया निशान खड़े किए हैं। उनका तर्क है कि इस नई नीति के तहत संविदा कर्मचारियों को 'लाइन परमिट' जारी करने जैसी बड़ी और अतिरिक्त कानूनी जिम्मेदारियां सौंप दी गई हैं। कर्मचारियों का कहना है कि जब वे पूरी जिम्मेदारी उठा रहे हैं, तो दुर्घटना होने की स्थिति में उन्हें केवल 4 लाख रुपये का बीमा कवर दिया जाता है, जो आज के समय में इस हाई-रिस्क जॉब के मुकाबले ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। संविदा संघ ने मांग की है कि उनका बीमा कवर बढ़ाया जाए और उन्हें अंतरराष्ट्रीय मानक के सुरक्षा उपकरण (PPE किट्स) दिए जाएं।

8 हजार पद रिक्त, फिर भी आउटसोर्सिंग का खेल

बिजली विभाग की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा करते हुए कर्मचारियों ने बताया कि छत्तीसगढ़ की बिजली कंपनियों में वर्तमान में लगभग 8,000 से अधिक तकनीकी पद खाली पड़े हैं। इसके बावजूद विभाग स्थायी और नियमित भर्ती करने से बच रहा है। पूरा काम संविदा और आउटसोर्सिंग के जरिए ठेके पर कराया जा रहा है। इससे न केवल मौजूदा संविदा कर्मचारियों पर काम का मानसिक और शारीरिक दबाव बढ़ रहा है, बल्कि सुरक्षा मानकों की अनदेखी के कारण पूरे प्रदेश की बिजली आपूर्ति और व्यवस्था भी कभी भी चरमरा सकती है।

मौखिक आदेशों का शिकार हो रहे कर्मचारी, जवाबदेही से बचता विभाग

प्रदर्शनकारियों ने एक और गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि अक्सर सब-इंजीनियरों या उच्च अधिकारियों द्वारा उन्हें मोबाइल या मौखिक निर्देशों के आधार पर चालू लाइन (लाइव वायर) पर काम करने के लिए भेज दिया जाता है। यदि इस दौरान कोई अप्रिय घटना या दुर्घटना घटित हो जाती है, तो अधिकारी पूरी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं और सारा दोष संविदा कर्मचारी की लापरवाही बताकर उस पर मढ़ दिया जाता है। कर्मचारियों ने दो टूक शब्दों में कहा है कि जब तक उनके नियमितीकरण, पुख्ता सुरक्षा और बीमे की मांगों पर शासन स्तर से कोई लिखित और ठोस निर्णय नहीं लिया जाता, तब तक यह अनिश्चितकालीन हड़ताल और धरना प्रदर्शन इसी तरह जारी रहेगा।