ममता बनर्जी के गढ़ में महा-बगावत: कालीघाट की बैठक से सांसदों-विधायकों ने बनाई दूरी, टूट की कगार पर तृणमूल
कोलकाता | हालिया चुनावों में मिली शिकस्त के बाद तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर जारी अंदरूनी कलह अब एक बड़े विभाजन की ओर बढ़ती दिख रही है। विधायक दल में बिखराव के बाद अब पार्टी के संसदीय दल में भी दरार आना तय माना जा रहा है। संकट के इस दौर में तृणमूल प्रमुख ममता बनर्जी द्वारा बुलाई गई सांसदों और विधायकों की अहम बैठक में पार्टी के भविष्य पर गंभीर सवालिया निशान खड़े हो गए। इस बैठक में पार्टी के कुल 41 सांसदों में से केवल छह ही उपस्थित हुए। वहीं, विरोधी गुट से दूरी बनाने वाले 21 विधायकों में से भी महज आठ ही बैठक में पहुंचे, जो नेतृत्व के लिए बड़ा झटका है।
बैठक से बड़ी संख्या में नेताओं ने बनाई दूरी
इस सांगठनिक बैठक में अल्पसंख्यक जनप्रतिक्षियों की अनुपस्थिति ने पार्टी के भीतर गहरे संकट का संकेत दिया है। बैठक में शामिल होने वाले मुस्लिम विधायकों में फिरहाद हकीम एकमात्र चेहरा रहे, जबकि संसदीय दल के सभी छह मुस्लिम सांसद इस बैठक से नदारद रहे। इससे पहले जब विधायक दल में विभाजन हुआ था, तब जीते हुए 31 मुस्लिम विधायकों में से 17 बागी गुट के साथ चले गए थे। इसके अतिरिक्त, चुनाव प्रचार के दौरान पार्टी का प्रमुख चेहरा रहीं महुआ मोइत्रा और सायानी घोष जैसी बड़ी नेताओं ने भी इस बैठक से दूरी बनाए रखी, जिससे साफ है कि संसदीय दल का एक बड़ा हिस्सा पाला बदलने की तैयारी में है।
भविष्य की चिंता और जांच का डर
राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि चुनावी पराजय के बाद तृणमूल नेताओं में अपने सियासी भविष्य को लेकर असुरक्षा की भावना पैदा हो गई है। सूत्रों के मुताबिक, पार्टी से दूरी बनाने वाले कई नेता भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल होने की राह तलाश रहे हैं। इस दलबदल की एक बड़ी वजह कई नेताओं के खिलाफ चल रहे भ्रष्टाचार के मामले और भविष्य में होने वाली कानूनी जांच का डर भी माना जा रहा है। इस बीच, मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने दिल्ली का दौरा कर केंद्रीय नेतृत्व के साथ भावी रणनीति पर विचार-विमर्श किया। रणनीति यह बनाई जा रही है कि विरोधी गुट को आगे कर मूल पार्टी पर ही दावा ठोक दिया जाए, ताकि राज्य में मुख्य विपक्षी दल के रूप में वाम मोर्चे के दोबारा उभार को रोका जा सके।
संगठन में फेरबदल और नई जिम्मेदारियां
तमाम राजनीतिक उथल-पुथल के बीच ममता बनर्जी ने संगठन को बिखरने से बचाने के लिए कुछ महत्वपूर्ण प्रशासनिक बदलाव किए हैं। उन्होंने अभिषेक बनर्जी पर अपना भरोसा बरकरार रखते हुए उन्हें राष्ट्रीय महासचिव के पद पर बनाए रखा है। इसके साथ ही पूर्व मंत्री चंद्रिमा भट्टाचार्य को पार्टी का नया प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। सांगठनिक ढांचे को मजबूती देने के लिए डोला सेन और डेरेक ओ'ब्रायन को राष्ट्रीय संयुक्त महासचिव की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इन बदलावों के बावजूद पार्टी के अस्तित्व को बचाए रखना नेतृत्व के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।

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