मौत की चट्टान: फॉरचून स्टोन कंपनी की लापरवाही ने ली मासूम सोनम की जान
गरीब की बेटी दफन हुई पत्थरों के नीचे, कंपनी ने शुरू किया रफा-दफा का खेल – प्रशासन भी खामोश
मुख्यमंत्री मोहन यादव के मंसूबों पर पानी फिरता जिला प्रशासन
लवकुशनगर। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव लगातार यह संदेश देते आए हैं कि विकास कार्य नियमों के अनुसार हों और पर्यावरण को सुरक्षित रखते हुए आगे बढ़ें। मुख्यमंत्री ने पहले भी ऐसे हादसों पर अधिकारियों को चेताया है, लेकिन इसके बावजूद कंपनियां पैसों और रसूख के दम पर मुख्यमंत्री की मंशा पर पानी फेर रही हैं। इसका ताजा उदाहरण कटहरा गांव की फॉरचून स्टोन प्राइवेट लिमिटेड की ग्रेनाइट खदान है, जो एक बार फिर मौत का गढ़ साबित हुई। सोमवार को हुई दर्दनाक घटना में 14 वर्षीय सोनम की मौत हो गई, जबकि उसकी 11 वर्षीय बहन खुशबू गंभीर हालत में अस्पताल में जिंदगी से जूझ रही है। दोनों मासूम बकरियां चराने खेत की ओर गई थीं, तभी अचानक खदान में जमा विशाल चट्टान खिसक गई और उन पर जा गिरी। सोनम की मौके पर ही मौत हो गई।
हादसे के बाद कंपनी का असली चेहरा
ग्रामीणों का कहना है कि घटना के तुरंत बाद खदान संचालक और उसके सहयोगियों ने मामले को दबाने की कोशिश की। कई ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि कंपनी प्रबंधन अक्सर दावा करता है कि वह अधिकारियों तक अपनी पहुंच और प्रभाव के कारण कार्रवाई से बच जाता है। उल्लेखनीय है कि कटहरा की इस खदान में इससे पहले भी हादसे हो चुके हैं, जिनमें मजदूरों और ग्रामीणों की जानें गई हैं। लेकिन हर बार कंपनी प्रशासनिक उदासीनता और अपनी आर्थिक ताकत के सहारे दंड से बच निकलती रही है।
प्रशासन और विभागों की मिलीभगत
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर जिम्मेदार अधिकारी इस गंभीर मामले में अब तक खामोश क्यों हैं? ग्रामीणों का कहना है कि खदान संचालक ने लीज से कहीं अधिक क्षेत्र में अवैध उत्खनन कर कई एकड़ वनभूमि पर कब्जा कर रखा है। नतीजतन जंगल की जमीन धीरे-धीरे खोखली होती जा रही है, लेकिन विभाग आंख मूंदे बैठे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि खदान क्षेत्र में खुलेआम नियमों को तोड़ा जा रहा है, सुरक्षा मानकों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं और लोगों की जान खतरे में डाली जा रही है।
वन विभाग और खनिज विभाग को कई बार शिकायतें दी गईं, लेकिन कार्रवाई करने के बजाय अधिकारी खामोश बने रहे। यहां तक कि जब हादसों में निर्दोष लोगों की जान चली जाती है, तब भी विभागीय जांच केवल कागजों तक सीमित रह जाती है। इससे यह धारणा और गहरी हो रही है कि जिम्मेदार अधिकारी कंपनी को बचाने के लिए ही सक्रिय रहते हैं। ग्रामीणों का मानना है कि प्रशासन और विभागों की यह चुप्पी कहीं न कहीं कंपनी और अधिकारियों की मिलीभगत की ओर इशारा करती है।
सवालों के घेरे में सिस्टम
इस दर्दनाक हादसे ने एक बार फिर पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सोनम की मौत भी चुप्पी और समझौते के अंधेरे में गुम हो जाएगी, जैसे पहले हुई मौतें गुम हो गई थीं?
क्या प्रशासन और विभाग केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित रहकर गरीबों की लाशों पर कंपनियों की मुनाफाखोरी को खुला छोड़ते रहेंगे? अगर हर हादसे के बाद जिम्मेदार अफसर कंपनी के बचाव में बयान देते रहेंगे तो फिर न्याय की उम्मीद किससे की जाए?
ग्रामीणों का कहना है कि जब तक सख्त कार्रवाई नहीं होती, तब तक जंगलों को खोखला कर और इंसानी जिंदगियां निगलने वाली यह मौत की खदान चालू रहेगी। सवाल यह भी है कि आखिर कब तक आम लोगों की जिंदगी पत्थरों के ढेर के नीचे कुचली जाती रहेगी और कब तक जिम्मेदार लोग अपनी खामोशी से इस खून-खराबे के हिस्सेदार बने रहेंगे?
कलेक्टर और खनिज अधिकारी के बयान
कलेक्टर पार्थ जायसवाल ने कहा – आपके द्वारा जानकारी दी गई है, मैं मामले को दिखवाता हूं।
खनिज अधिकारी अमित मिश्रा ने दावा किया – यह खदान से 4 किलोमीटर दूर की घटना है। पटवारी ने बताया कि यह मजदूर परिवार पास के खेत पर काम कर रहा था।


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