किलेबंदी ढही तोहफ़ों के साथ: रामपुर की सीट गंवाने से लेकर बुलडोज़र एक्शन तक आजम ख़ान के मन की बातें, अखिलेश के सामने खुलेंगे पन्ने?
मेरठ: समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव और जेल से रिहा होकर आए समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता आजम खान की आठ अक्टूबर को रामपुर में प्रस्तावित मुलाकत शिकायत और शिकवों के साथ होगी? सियासी जानकार मान रहे हैं कि आदत के मुताबिक आजम खान शिकायत की लंबी फेहरिस्त अखिलेश को थमा सकते हैं। इसी के साथ बसपा की लखनऊ रैली से एक दिन पहले आठ अक्टूबर को दोनों नेताओं के मिलन की टाइमिंग को लेकर भी सियासी गलियारों में कई कयास लगाए जा रहे हैं, क्योंकि आजम खान के बसपा में जाने की चर्चा कई दिन तक काफी गरम रही है, वैसे आजम बुधवार को ही बसपा में जाने से साफ इनकार कर चुके हैं। वेस्ट यूपी की राजनीति पर नजर रखने वालों में शामिल डॉक्टर रविंद्र प्रताप राणा और रवि शर्मा का कहना है कि आजम खान शब्दों के जादूगर हैं। वह अपनी शिकायत को भी शालीनता के साथ तो रखेंगे लेकिन वह बात को पैनेपन, तीखेपन से पेश करने में माहिर हैं। आजम के बात करने का अंदाज एक साथ कई मायने छोड़ जाता है, इसलिए आजम और अखिलेश की मुलाकात पर लोगों की कड़ी नजर रहेगी।
जेल में न मिलने आने से खफा आजम
सपा के एक प्रदेश स्तरीय नेता और सियासत पर नजर रखने वालों का कहना है कि आजम खान मुलाकात में अखिलेश यादव से सबसे पहले जेल से रिहाई के वक्त किसी बड़े एसपी नेता के मिलने नहीं आने की शिकायत रख सकते हैं। दूसरे अपनी गुजारिश के बाद भी 2024 में अखिलेश यादव के रामपुर से लोकसभा चुनाव नहीं लड़ने की बात को नाराजगी के तौर पर पेश कर सकते हैं। इसी कड़ी में अपने करीबी को टिकट नहीं देकर खुद के सियासी दुश्मन को दिल्ली की संसद वाली मस्जिद के इमाम को लोकसभा का टिकट देने पर उनकी नाराजगी जाहिर कर सकते हैं।
आजम खान के विरोध में बोलने से नहीं रोका
हालांकि वह तल्ख बाते करते वक्त मुरादाबाद की लोकसभा सीट से अपने कहने पर रुचि वीरा को टिकट देने का शुक्रिया अदा भी कर सकते हैं। जानकारों के मुताबिक आजम की तरफ से शिकवा ये भी मुमकिन हैं कि जेल में रहते हुए लोकसभा चुनाव में पार्टी नेता रामपुर में उनके खिलाफ खूब बोले। हालांकि हाईकमान ने उन्हें रोका नहीं, इससे आजम के पार्टी में वजूद कमजोर होने का संदेश गया।
जियाउर्रहमान बर्क की तरह साथ क्यों नहीं
शिकायत ये भी संभव है कि जब जब जोहर यूनिवर्सिटी, मैरिज हॉल या अन्य जगह पर प्रशासन का बुलडोजर चला, तब पार्टी लखनऊ से लेकर रामपुर तक उनके साथ खड़ी नहीं हुई। यहां तक की एसपी का बड़ा नेता परिवार को दिलासा देने भी घर या जेल नहीं पहुंचा। बड़ी शिकायत ये भी मुमकिन है कि जिस तरह संभल जामा मस्जिद विवाद के बाद एफआईआर होने पर वहां के सांसद जियाउर्रहमान बर्क के साथ पार्टी सड़क से सदन तक खड़ी हुई और आवाज बुलंद की, वैसा साथ हमें (आजम परिवार) क्यों नहीं मिला। इससे भी पार्टी के साथ नहीं होने का संदेश गया और शासन प्रशासन ने कार्रवाई को तेज रखा। इसी तरह की तमाम शिकायत आजम की झोली से निकल सकती हैं।

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